गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है। भगवान श्री राम के आदर्श, उनके वचन और उनका जीवन हर युग में मानव जाति का मार्गदर्शन करते आए हैं। यहाँ रामचरितमानस की 20 सबसे प्रभावशाली और पवित्र चौपाइयां दी गई हैं। इन्हें पढ़ें और अपने जीवन में उतारें।
भावार्थ: जो मंगलों के भवन (उत्पत्ति स्थान) और अमंगलों को हरने वाले हैं, वे राजा दशरथ के आंगन में खेलने वाले बालरूप श्री राम मुझ पर कृपा करें। (यह चौपाई हर प्रकार के दुखों और संकटों को दूर करने के लिए जपी जाती है।)
भावार्थ: ईश्वर ने इस संसार में कर्म को ही प्रधान बना रखा है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल चखना (भोगना) पड़ता है। इसलिए हमेशा अच्छे और नेक कर्म करने चाहिए।
भावार्थ: रघुकुल की यह रीति हमेशा से चली आ रही है कि प्राण भले ही चले जाएं, परंतु दिया हुआ वचन कभी खाली नहीं जाना चाहिए। यह चौपाई हमें सत्य और वचनबद्धता की प्रेरणा देती है।
भावार्थ: अयोध्या के राजा भगवान श्री राम को अपने हृदय में धारण करके नगर में प्रवेश करो, तुम्हारे सभी कार्य सिद्ध हो जाएंगे। (जब हनुमान जी लंका में प्रवेश कर रहे थे, तब उन्होंने यही सोचकर प्रभु को हृदय में रखा था।)
भावार्थ: भगवान श्री राम का कार्य पूरा किए बिना मुझे (हनुमान जी को) विश्राम कहाँ! यह चौपाई हमें सिखाती है कि जब तक हमारा लक्ष्य (धर्म और कर्तव्य) पूरा न हो जाए, हमें रुकना नहीं चाहिए।
भावार्थ: जिस प्रकार पारस मणि के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है, उसी प्रकार दुष्ट मनुष्य भी अच्छी संगति (सत्संगति) पाकर सुधर जाते हैं।
भावार्थ: जिस मनुष्य की जैसी भावना (सोच और श्रद्धा) होती है, उसे भगवान उसी रूप में दिखाई देते हैं। भगवान हर रूप में विद्यमान हैं।
भावार्थ: जो कुछ भी भगवान श्री राम ने रच रखा है, वही होगा। इस पर तर्क-वितर्क करके व्यर्थ में बात बढ़ाना मूर्खता है। हमें ईश्वर की इच्छा पर विश्वास रखना चाहिए।
भावार्थ: भगवान श्री हरि अनंत हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता), और उनकी कथाएं भी अनंत हैं। संत लोग उसे बहुत प्रकार से कहते और सुनते हैं।
भावार्थ: धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी—इन चारों की असली परीक्षा विपत्ति (मुसीबत) के समय ही होती है।
भावार्थ: बिना सत्संग (अच्छे लोगों की संगति) के मनुष्य में विवेक (अच्छा-बुरा समझने की शक्ति) नहीं आता। और सत्संग भी श्री राम की कृपा के बिना नहीं मिलता।
भावार्थ: जो मित्र अपने मित्र का दुःख देखकर दुःखी नहीं होते, उन्हें तो देखने में भी बहुत पाप लगता है। एक सच्चा मित्र हमेशा सुख-दुःख में साथ देता है।
भावार्थ: जामवंत जी हनुमान जी से कहते हैं - हे तात! इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन काम है, जो तुम्हारे द्वारा नहीं हो सकता? (यह चौपाई आत्मविश्वास जगाने के लिए अद्भुत है।)
भावार्थ: मैं इस सम्पूर्ण जगत को श्री सीता-राम जी से युक्त (उनके द्वारा रचित और उन्हीं में समाहित) जानकर अपने दोनों हाथ जोड़कर सभी को प्रणाम करता हूँ।
भावार्थ: मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज (धूल) की वंदना करता हूँ। वह रज सुंदर, सुगंधित, और प्रेम से परिपूर्ण है, जो सारे दुखों का नाश करने वाली है।
भावार्थ: भगवान के 'नाम' की बड़ाई मैं कहाँ तक करूँ? स्वयं श्री राम भी अपने 'नाम' के गुणों का पूरी तरह गान नहीं कर सकते। राम-नाम की महिमा साक्षात राम से भी बड़ी है।
भावार्थ: मेरे मन में ऐसा दृढ़ विश्वास है कि भगवान श्री राम के दास (भक्त) स्वयं श्री राम से भी अधिक महान होते हैं। (जैसे हनुमान जी)।
भावार्थ: जिस प्रकार जल से भरे हुए बादल धरती के पास झुककर वर्षा करते हैं, उसी प्रकार जो बुद्धिमान और विद्वान होते हैं, वे विद्या प्राप्त करने के बाद हमेशा विनम्र (झुके हुए) हो जाते हैं।
भावार्थ: श्री राम बालि से कहते हैं—छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्र की स्त्री और अपनी बेटी—ये चारों एक समान होती हैं। जो इन्हें बुरी नज़र से देखता है, उसे मारने में कोई पाप नहीं है।
भावार्थ: संत पुरुष हमेशा दूसरों के भले (परहित) के लिए दुःख सहते हैं, जबकि असंत (दुष्ट) लोग अभागे होते हैं जो दूसरों को दुःख देने के लिए ही कष्ट उठाते हैं।